कुमार गौरव
बांदा। स्वास्थ विभाग नें जाड़े में “मरीजों को ठिठुर-ठिठुर कर यमलोक की सैर कराने की व्यवस्था” कर दी है। मरीजों के “दांत ठंड में किट-किट बजेंगे”। इससे “मौत का आया राम गया राम की गति” बढ़ जानें की आशंका बलवती हो गई है। खबर की पटकथा का आश्चर्य जनक पहलू यह है की जिला अस्पताल में भर्ती मरीजों को दिए जाने वाले “कंबलों का वजन मात्र एक किलोग्राम” है। इतने हल्के कंबलों से मरीजों का ठंड से बचाव असंभव है,जबकि शासन की “गाइड लाइन के मुताबिक एक कंबल का वजन दो किलो 200 ग्राम” होना चाहिए।

जिला अस्पताल में महिला, पुरुष, चिल्ड्रेन, और इमरजेंसी वार्ड में मरीजों को भर्ती किया जाता है। इन दिनों सुबह और शाम पड़ रही ठंड से बचने के लिए गर्म कपड़ों का प्रयोग शुरू हो चुका हैं, परंतु यहां मरीजों को दिए जाने वाले कंबल बहुत ही हल्के हैं। यह मरीजों का सर्दी से बचाव नहीं कर पायेंगे।

इन हालातों में अस्पताल के कंबल की तौल कराई गई तो उसका वजन एक किलो चार ग्राम ही निकला, जो मानक के आधे से भी कम है। कंबलों की खरीद में मानक का ध्यान नहीं रखा गया। कंबल का वजन दो किलो 200 ग्राम होना चाहिए। इसके साथ ही 70 प्रतिशत ऊनी होना चाहिए। कंबल की लंबाई 235 और चौड़ाई 140 सेंटीमीटर होना चाहिए, लेकिन कंबल के मानक कम हैं। यह “मौत का परकाला” साबित हो सकते हैं।













