कुमार गौरव
बांदा। यह सिर्फ बालू अवैध खनन की खबर नहीं है,यह उस “सिस्टम के चेहरे से नकाब उतार तहलका मचा देने वाली बड़ी खबर” है,जिसमें “कानून काग़ज़ों में कैद है!ज़मीन पर माफिया राज बेखौफ” दौड़ रहा है! दिन के उजाले में शांत दिखने वाली केन,यमुना और बागे नदियाँ,जैसे ही सूरज ढलता है,खनन माफियाओं की मशीनों के नीचे “कराहने लगती” हैं। रात के अंधेरे में नदियों का सीना छलनी किया जा रहा है। पोकलैंड,जेसीबी और भारी मशीनें धड़ल्ले से बालू उगल रही हैं, और कानून? वह कहीं नजर नहीं आता!यह स्थिति यहां जिले की सभी तहसील क्षेत्रों में है।

अवैध खनन को लेकर भले ही यूपी सरकार की प्रदेश स्तर पर छीछालेदर हो रही हो,लेकिन यहां के जिम्मेदार अफसर अपनी-अपनी जेबें भरने में पूरी तरह व्यस्त हैं? हर शिकायत पर रटा-रटाया जवाब “जांच कराई जाएगी” और जांच के नाम पर या तो फाइल दबा दी जाती है या फिर खदानों का बनावटी मौका मुआयना कर शिकायतकर्ता को ही झुठला दिया जाता है?

जिले में इस समय डेढ़ दर्जन से अधिक बालू खदानों को वैध अनुमति मिली हुई है। हर खदान आवंटन से पहले डीएम और खदान संचालक के बीच नियमों का एक स्पष्ट अनुबंध होता है,लेकिन”जमीनी हकीकत”यह है कि”अनुबंध डस्टबिन में,नियम काग़ज़ों में और खनन मनमर्जी से”। नियम साफ कहते हैं “पोकलैंड मशीनों से खनन वर्जित”है!सूर्यास्त के बाद खनन पूरी तरह प्रतिबंधित और नदी की धारा से बालू निकालना अपराध” है!लेकिन बांदा में नियमों की इस फेहरिस्त की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं! काली रात में मशीनें गरजती हैं,नदी का बहाव मोड़ा जाता है,और प्रशासन आंख मूंदे बैठा रहता है?

खनन नियमों में कुल 32 शर्तें तय हैं,लेकिन पालन “शून्य” ? यहाँ नियम मानने वाला नहीं, तोड़ने वाला सुरक्षित है! क्या योगी सरकार को गुमराह किया जा रहा है? क्या अवैध खनन के इस खुले खेल में शामिल अधिकारियों पर कभी कार्रवाई होगी? या फिर नदियाँ यूं ही लुटती रहेंगी और अफसर मौज काटते रहेंगे?













