कुमार गौरव
बांदा। बुंदेलखंड को पृथक राज्य का दर्जा दिलाने की मांग को एक बार फिर तेजी से बल मिल रहा है। इस आंदोलन को राष्ट्रीय किसान यूनियन (महाशक्ति) के राष्ट्रीय महामंत्री और बुंदेलखंड प्रभारी बबलू सिंह का खुला समर्थन मिला है। उन्होंने फिल्म अभिनेता व क्षेत्र के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता राजा बुंदेला के साथ हाथ मिलाते हुए केंद्र सरकार से बुंदेलखंड के विकास और प्रशासनिक स्वायत्तता के लिए तत्काल निर्णय लेने की मांग की है। बांदा में आयोजित एक विशेष मुलाकात के दौरान बबलू सिंह ने कहा कि बुंदेलखंड क्षेत्र लंबे समय से विकास के मामले में पिछड़ता चला आ रहा है। यहां की जनता रोजगार, सिंचाई, आधारभूत ढांचा और शासन की कमियों के कारण लगातार संघर्ष में जी रही है। “आज बुंदेलखंड की आवाज न केवल उठ रही है, बल्कि एक जन आंदोलन का रूप लेने लगी है। इस आंदोलन को मजबूत करने के लिए हमारी किसान यूनियन पूरी तरह से तैयार और प्रतिबद्ध है।”

बबलू सिंह ने केंद्र सरकार के लिए बुंदेलखंड के विकास के लिए तीन वैकल्पिक सुझाव भी रखे। पहला विकल्प बुंदेलखंड को पृथक राज्य बनाने का है, जिससे क्षेत्र को अपने संसाधनों का सदुपयोग करने और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप नीतियां बनाने का अधिकार मिल सके। दूसरा विकल्प इसे केंद्र शासित प्रदेश घोषित करने का है, ताकि सीधे केंद्र सरकार की निगरानी में विकास कार्य त्वरित गति से आगे बढ़ सकें। तीसरा और विशेष सुझाव बोडोलैंड मॉडल की तर्ज पर बुंदेलखंड के लिए एक स्वायत्त शासन परिषद (गवर्निंग काउंसिल) का गठन करने का है, जो क्षेत्र के विकास, भाषा, संस्कृति और आर्थिक योजनाओं की निगरानी करे।

उन्होंने बताया कि वर्तमान में चित्रकूट और झांसी मंडल के सात जिलों—बांदा, छतरपुर, टीकमगढ़, दतिया, दमोह, मऊरानी, और झांसी—के साथ-साथ कौशांबी, फतेहपुर और कानपुर देहात को भी पृथक राज्य के दायरे में शामिल करने की मांग उठ रही है। “पिछले एक वर्ष से हम गांव-गांव पदयात्रा निकाल रहे हैं,” बबलू सिंह ने कहा, “इसका उद्देश्य आम जनता को आंदोलन के महत्व और पृथक राज्य की आवश्यकता के बारे में जागरूक करना है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अब जाग चुके हैं और वे स्पष्ट रूप से अपना अधिकार मांग रहे हैं।” बबलू सिंह ने जोर देकर कहा कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल या व्यक्तिगत स्वार्थ से प्रेरित नहीं है। “यह बुंदेलखंड के समग्र विकास, सांस्कृतिक पहचान और जनता के मौलिक अधिकारों के लिए है। अब इसे उग्र आंदोलन की बजाय एक विचार क्रांति बनाने की आवश्यकता है।” उन्होंने यह भी बताया कि लोकसभा व विधानसभा सीटों के संभावित परिसीमन के मद्देनजर अब पृथक राज्य की संभावना और भी मजबूत हो गई है। “जब पूरे क्षेत्र की जनता एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद करेगी, तो कोई भी सरकार इसे नजरअंदाज नहीं कर सकती।”

फिलहाल, राजा बुंदेला सहित आंदोलन के अन्य नेता और कार्यकर्ता बुंदेलखंड के सभी जिलों में जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं। साथ ही, सरकार से जल्द गंभीरता दिखाने और इस मांग पर विचार करने का आह्वान किया जा रहा है। इतिहास गवाह है कि पृथक उत्तराखंड, झारखंड और तेलंगाना के गठन के पीछे भी ऐसे ही लंबे जन आंदोलन थे। अब बुंदेलखंड की तड़प भी उसी राह पर है। और लगता है कि इस बार आंदोलन की गरिमा और जन समर्थन के बलबूते उसे साकार रूप दिया जा सकता है।










