कुमार गौरव
बांदा। जिले में मोरंग के अवैध खनन और उपखनिजों की ओवरलोडिंग अब छुपा हुआ अपराध नहीं,बल्कि खुलेआम फलता-फूलता कारोबार बन चुका है। हालात ऐसे हैं कि नियमों की किताबें धूल फांक रही हैं और ज़मीन पर माफिया का हुक्म चल रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह कि जिस विभाग पर रोक लगाने की जिम्मेदारी है,वही विभाग कथित तौर पर पूर्ण रूप से निष्पक्ष कार्यवाई से गुरेज किये है? ज़मीनी हकीकत यह है कि अधिकांश खदानों में अवैध खनन अपने चरमोत्कर्ष पर है,लेकिन विभागीय कार्रवाई दिखावे से आगे नहीं बढ़ पा रही।

तेरा ब ,रेहुटां, भदावल समेत कई इलाकों में अवैध खनन की शिकायतें अब सिर्फ फाइलों तक सीमित नहीं रहीं। ग्रामीणों की आवाज़, स्थानीय चर्चाएं और ज़मीनी हालात एक ही कहानी कहते हैं अवैध खनन चरमोत्कर्ष पर है!ओवरलोड ट्रक दिन-रात सड़कों को रौंद रहे हैं और कार्रवाई? कथित तौर पर सिर्फ खानापूरी!

सूत्रों का दावा है कि कई जगहों पर निरीक्षण पहले से “सूचित” कर दिए जाते हैं, ताकि सब कुछ “कागज़ों में दुरुस्त” दिखाया जा सके। इस पूरे खेल का सबसे ‘खतरनाक पहलू’ है ‘चयनित कार्रवाई’। आरोप है कि सेटिंग गेटिंग का फार्मूला लागू हैं वहां जांच में खदानें नियमों के अनुरूप संचालित घोषित कर दी जाती हैं। और जहां अभी फार्मूला अधूरा है वहां कार्रवाई की चपत लगा दी जाती है। यानी कानून सबके लिए बराबर नहीं, बल्कि रिश्तों और समीकरणों पर टिका हुआ नजर आ रहा है!

खनन निदेशालय ने साफ निर्देश दे रखे हैं अवैध खनन और ओवरलोडिंग पर बड़े पैमाने पर छापेमारी हो। वो भी अंतरराज्यीय उपखनिज परिवहन केवल आईएसटीपी के साथ। खनन स्थल पर ही लोडिंग मानकों का कड़ाई से पालन लगातार और बिना भेदभाव के हो। लेकिन सवाल उठता है अगर निदेशालय सख्त हैं, तो बांदा में हालात इतने ढीले क्यों ? ज़मीनी हकीकत यही है कि यहां कार्रवाई और अवैध खनन के बीच नूरा-कुश्ती चल रही है ऊपर से सख्ती का तमाशा,भीतर से मूक सहमति!
खनिज अधिकारी राज रंजन दावा करते हैं कि विभाग अवैध खनन पर सख्त है और कई कार्रवाई की गई हैं। लेकिन ज़मीन पर सच्चाई कुछ और ही कहानी सुना रही है अगर सख्ती है, तो अवैध खनन रुक क्यों नहीं रहा? अगर कार्रवाई है, तो ओवरलोड ट्रक बेधड़क क्यों दौड़ रहे हैं? शिकायतों के बाद भी कई खदानें जांच से बाहर क्यों हैं?













