January 27, 2026 9:15 am

विधायक विशंभर की हुंकार से गर्माया आंदोलन: बोले- लाठी भी खाएंगे, जेल भी जाएंगे।

कुमार गौरव

बांदा। बबेरू कस्बा इन दिनों “सिर्फ अतिक्रमण हटाओ अभियान” का नहीं, बल्कि “व्यापारियों के सब्र के टूटने” और “सियासी टकराव” का “गवाह” बन चुका है। तहसील परिसर में “उमड़ा व्यापारियों का सैलाब और उनके बीच समाजवादी पार्टी के विधायक विशंभर सिंह यादव” की “आक्रामक हुंकार” ने “माहौल को पूरी तरह गर्मा” दिया। यह “साफ” हो गया है कि “अब यह लड़ाई सिर्फ दुकानों की नहीं, बल्कि रोजी-रोटी और सम्मान” की बन चुकी है।

विधायक विशंभर सिंह यादव ने “आंदोलित व्यापारियों के जमीर” को “झकझोरते” हुए तीखा सवाल दागा “जब आपका आशियाना उजड़ रहा है, तब आपके संगठन के प्रांतीय और राष्ट्रीय नेता कहां हैं ?” उन्होंने बड़े व्यापारी नेताओं पर “स्वार्थ साधने” का आरोप लगाते हुए कहा कि “क्या वे सिर्फ अपने फायदे के लिए ही व्यापारियों के साथ खड़े होते” हैं? विधायक ने व्यापारियों से “आह्वान” किया कि “वे ऐसे नेताओं को भी आंदोलन में बुलाएं और जवाबदेही तय” करें। सपा विधायक ने मंच से एलान किया कि समाजवादी पार्टी बबेरू के व्यापारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है। “अगर लाठी खानी पड़ी तो भी, जेल जाना पड़ा तो भी हम पीछे नहीं हटेंगे। किसी भी व्यापारी का गलत उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह लड़ाई सड़क से लेकर सदन तक लड़ी जाएगी।” विधायक के इस ऐलान के बाद पूरा परिसर तालियों और नारों से गूंज उठा। दरअसल, बबेरू कस्बे में प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान ने व्यापारियों की चिंता बढ़ा दी है।

व्यापारियों का कहना है कि बेतरतीब कार्रवाई से उनका वर्षों पुराना कारोबार तबाह हो जाएगा। इसी के विरोध में व्यापारियों ने तहसील परिसर में धरना-प्रदर्शन किया और मंडलायुक्त को संबोधित ज्ञापन सौंपा। व्यापारियों की मांग है कि सड़क के मुख्य बिंदु से साढ़े 27 फुट छोड़कर ही अतिक्रमण हटाया जाए। उनका दावा है कि यदि प्रशासन इस फार्मूले को मान लेता है तो वे स्वयं अभियान में पूरा सहयोग करेंगे। व्यापारियों का कहना है “हम विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास के नाम पर विनाश मंजूर नहीं।” व्यापारियों ने दो टूक कहा है कि अगर उनकी मांगों को अनसुना किया गया तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा। सपा विधायक के खुले समर्थन से प्रशासन पर दबाव बढ़ गया है और बबेरू की सड़कों पर अब आंदोलन और सियासत का टकराव साफ दिखाई देने लगा है।

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