कुमार गौरव
बांदा। धीरेंद्र शास्त्री की हनुमंत कथा का तीसरा दिन बांदा में भक्तों के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा और प्रेरणा का खजाना साबित हुआ। “दिव्य दरबार में अर्जियां स्वीकार करने का चमत्कार कार्यक्रम” आयोजित करते हुए शास्त्री जी ने हनुमान जी के संकटों से उबरने और भगवान राम के प्रति उनकी अटूट भक्ति के गुणों पर जोर दिया। उन्होंने सुरसा माता से मुकाबला, समुद्र लांघना और अर्जुन के बाणों के पुल को पार करने जैसे प्रसंगों के माध्यम से हनुमान जी की अद्भुत शक्ति, पराक्रम और भक्ति-शक्ति का विस्तृत वर्णन किया।

शास्त्री जी ने बताया कि हनुमान जी ने सुरसा माता के विशाल मुख को देखकर छोटा रूप धारण किया और उनके पेट में प्रवेश कर बाहर निकलते हुए अपना कार्य पूर्ण किया। यह उदाहरण भक्तों के लिए यह संदेश लेकर आया कि कठिन परिस्थितियों और जीवन की बाधाओं को धैर्य, बुद्धि और समर्पण के साथ पार किया जा सकता है। कथा के दौरान उन्होंने अर्जुन और हनुमान जी के बीच हुए प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि अर्जुन ने बाणों का पुल बनाया, लेकिन हनुमान जी ने अपनी शक्ति से उस पुल को और मजबूत किया। इस प्रसंग के माध्यम से शास्त्री जी ने हनुमान जी की अतुलनीय शक्ति और संकटमोचन योग्यता को रेखांकित किया।

भक्ति और समर्पण पर बल देते हुए शास्त्री जी ने कहा कि हनुमान जी ने राम जी के कार्यों में कभी कमी नहीं की और हर चुनौती को स्वीकार किया। उन्होंने भक्तों से आग्रह किया कि वे हनुमान जी से संकटों से निकलने, बड़ों का सम्मान करने और निस्वार्थ भाव से सेवा करने जैसी सीख लें, जिससे वे भी राम जी और हनुमान जी के प्रिय बन सकें।

तीसरे दिन की कथा हनुमान जी के पराक्रम, बुद्धि और भक्ति के अद्भुत संगम पर केंद्रित थी। भक्तों ने कहा कि इस कथा ने उनके जीवन में नई दिशा और ऊर्जा का संचार किया। शास्त्री जी का यह प्रवचन भक्तों के लिए जीवन में सफल होने और ईश्वर के निकट जाने की प्रेरणा का स्त्रोत बना।













