कुमार गौरव
बांदा। हनुमंत कथा के दूसरे दिन बागेश्वर पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने धर्म, भक्ति और सनातन पर गहन व्याख्यान देते हुए श्रद्धालुओं को भक्ति का वास्तविक स्वरूप समझाया। उन्होंने कहा कि सच्ची भक्ति वही है, जो सुख-दुख में निरंतर बनी रहे। केवल स्वार्थ के लिए की गई भक्ति महज़ दिखावा है।

पंडित शास्त्री ने बताया कि भक्ति के साथ करुणा का होना आवश्यक है, और जब दोनों का समन्वय होता है, तभी श्रेष्ठ भक्ति का जन्म होता है। उन्होंने भगवान के परम भक्त हनुमान जी के जीवन से विनम्रता, प्रभु प्रेम और सेवा भाव के प्रसंग सुनाए।
अपने प्रवचन में उन्होंने अहंकार को विनाश का कारण और विनम्रता को महानता की कुंजी बताया। विपत्ति के समय स्वयं को छोटा करके अवसर की प्रतीक्षा करने का संदेश देते हुए उन्होंने ‘सुरसा और हनुमान’ प्रसंग का तार्किक वर्णन किया। पंडित शास्त्री ने हनुमान जी को विद्या के हर क्षेत्र में निपुण बताते हुए कहा कि उनके पास आठ सिद्धियां थीं, लेकिन उन्होंने कभी अभिमान नहीं किया। उन्होंने ‘किष्किंधा कांड’ को विचार, ‘लंका कांड’ को कार्य और ‘सुंदर कांड’ को विचार व कार्य का संगम बताते हुए जीवन में पहले सोचने, फिर करने, और फिर पुनः विचार करने की प्रेरणा दी।

बागेश्वर सरकार ने अपनी मधुर वाणी में ‘बाला जी’ और अन्य भजन प्रस्तुत कर श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। उन्होंने कहा कि हनुमान जी को पाने के लिए कुछ खोना नहीं पड़ता, बस स्वयं को उनके प्रति समर्पित करना होता है। इतना जप करो कि यमराज भी आपका नाम अपने खाते से हटा दें। कलियुग में राम नाम को भवसागर पार कराने वाला बताते हुए उन्होंने श्रद्धालुओं से भलाई करने का आग्रह किया। “यदि लाभ चाहते हो तो लाभ का उल्टा यानी भला करो,” उन्होंने कहा। शास्त्री जी के प्रवचन ने श्रोताओं के मन में भक्ति, सेवा और विनम्रता का भाव और भी दृढ़ किया।













