कुमार गौरव
बांदा। जिले की प्राणवायु मानी जाने वाली केन नदी संकट में है। यहां के ‘ज़रर बालू खदान’ क्षेत्र में अवैध बालू खनन का अंधाधुंध कारोबार इतना बढ़ गया है कि नदी का हर ज़र्रा-ज़र्रा थर्रा रहा है। स्थानीय निवासी, पर्यावरणविद और किसान समुदाय लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि केन नदी अब जीवन बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। खनन के नाम पर चल रहे इस अवैध कारोबार के पीछे राजू बंधुओं का नाम सामने आ रहा है, जिनका बतौर ‘गंगा-यमुनी प्रेम का गठजोड़’ स्थानीय स्तर पर लोहा माना जाता है। यह गठबंधन न केवल बेखौफ तरीके से खनन कर रहा है, बल्कि राजनीतिक संरक्षण के आरोपों के बीच प्रशासनिक तंत्र पर भी कथित तौर पर दबाव बनाए हुए है।

जानकारी के मुताबिक, पट्टाधारकों द्वारा पूरी तरह नगरीय पर्यावरण अधिकरण (एनजीटी) के नियमों को धता बताते हुए भारी पोकलैंड मशीनों के माध्यम से नदी के जलधारा में 10 से 15 फीट गहरे गड्ढे बनाए जा रहे हैं। ये गड्ढे न केवल नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बाधा डाल रहे हैं, बल्कि किनारे के खेतों की मेड़बंदी तक को खतरे में डाल रहे हैं। स्थानीय किसानों का आरोप है कि खनन के चलते उनके खेतों की भूमि कट रही है, सिंचाई के स्रोत खत्म हो रहे हैं और कई बार जलभराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। गांव बरई और नागावां निवासी रामस्वरूप यादव का कहना है, “पहले हम नदी के किनारे खेती करते थे, लेकिन अब हर साल एक बीघा ज़मीन गड्ढों में गिर जाती है। प्रशासन से लेकर खनिज विभाग तक कुछ नहीं कर रहा। सबको पता है कौन खनन कर रहा है, फिर भी कोई हल नहीं।” अजीब यह है कि पोकलैंड मशीनें न सिर्फ पट्टे के निर्धारित क्षेत्र से बाहर, बल्कि नदी के बीचों-बीच काम कर रही हैं। इस अवैध गतिविधि के बावजूद न तो खनिज विभाग की टीमें कार्रवाई कर रही हैं, न ही पुलिस कोई टांग अड़ा रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन और खनन माफिया के बीच मिलीभगत चल रही है।

एक अधिकारी के अनुसार, “हमारे पास तमाम शिकायतें हैं, लेकिन जब टीम को भेजा जाता है तो मशीनें गायब हो जाती हैं। कहीं ऊपर से दबाव है, तो कहीं नीचे से डर। अधिकारी भी इंसान हैं, उन्हें पता है कि ज़रर खादर में जाना खतरे से कम नहीं।” विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, मार्च 2024 से यहां खनन शुरू हुआ है, लेकिन इसकी गति इतनी बढ़ गई है कि अब ज़रर खादर को जिले में अवैध खनन का नया रिकॉर्ड बनाने की तैयारी है। माफिया का इतना रसूख है कि अधिकारी आधिकारिक जांच के दौरान भी वहां पहुंचने से पहले सोच-समझ कर चलते हैं। इस पूरे घमासान के बीच सवाल उठ रहे हैं कि जिम्मेदार अधिकारी जानकारी रखते हुए भी अवैध खनन क्यों नहीं रोक पा रहे हैं? क्या प्रशासन और राजू बंधुओं के बीच कोई अनौपचारिक समझौता चल रहा है? स्थानीय निवासी तो इसे “चुम्मा-चुम्मी” का खेल कह रहे हैं।
पर्यावरणविद् डॉ. अमित सक्सेना का कहना है, “केन नदी एक संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र है। ऐसे गहरे गड्ढे से जलीय जीवों का वास खत्म हो रहा है, प्रजनन चक्र बाधित हुआ है। अगर अब नहीं रोका गया, तो यह नदी एक बंजर तालाब बनकर रह जाएगी। नागरिक समाज और पर्यावरण संगठन लगातार जिला प्रशासन और राज्य सरकार से मांग कर रहे हैं कि ज़रर बालू खदान में अवैध खनन पर तुरंत रोक लगे, जांच कमेटी गठित की जाए और खनन माफिया के संरक्षकों के खिलाफ कार्रवाई हो। जब तक यह न हो, केन नदी बस यही सवाल पूछती रहेगी — “क्या मेरा जल, मेरी रेत, मेरा जीवन भी किसी के ‘गंगा-यमुनी प्रेम’ की भेंट चढ़ जाएगा?”










