कुमार गौरव
बांदा। बालू के अवैध खनन और परिवहन में नोटों की कड़क गड्डियों नें जिम्मेदार अधिकांश अफसरों को सूरदास बना दिया हैं। बालू का अवैध खनन पर तो अंकुश नहीं हैं ,वहीं अवैध ओवर लोड परिवहन परवान चढ़ रहा हैं। डीएम दुर्गा शक्ति नागपाल चाहते हुये भी “मातहतों की जयचंदी” के चलते पूर्णतः अवैध खनन रोकने में कामयाबी की पतंग नहीं उड़ा पा रही? अवैध खनन पकड़वाती हैं। जुर्माने की कार्यवाई होती हैं। इतना सबके बाद भी अवैध खनन फिर परवान चढ़ जाता हैं। “माफियाओं को प्रशासनिक शूली पर चढ़ने का भय” नहीं हैं? लाभ के चलते “सौ -सौ जूता खाय तमाशा घुस के देखें” सी कहावत चरित्रार्थ हो रही हैं?

जिले की कटु सच्चाई यह हैं की हर खदान में अवैध खनन हैं ? शहर से लगी भवानीपुर जो डीएम नें बंद कराई बताते हैं की वंहा बिना स्वीकृति के खनन और परिवहन बदस्तूर जारी हैं? खैर वैधानिक संचालित खदानों में ओवर लोड परिहवन जमकर खिलखिला रहा हैं? शासन से लेकर प्रशासन तक ओवरलोडिंग और अवैध खनन को लेकर सख्त तेवर अपनाए है। बैठकों में कड़ी कार्रवाई के निर्देश भी दिए जाते हैं। ओवरलोड वाहन सड़कों का खा रहे हैं। ओवरलोडिंग पर अंकुश लगाने के लिए प्रमुख मार्गों पर सीसीटीवी कैमरे लगवाए गए हैं। मकसद ऐसे वाहन कैमरे की जद में आ जाएं और चालान किया जा सके।

मौरंग के अवैध खनन और ओवरलोड परिवहन को लेकर माफिया ने इसका तोड़ निकाल लिया है। हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट से दूरी बनाए हुए हैं। मौरंग के परिवहन में लगे 80 फीसदी से ज्यादा वाहनों में पुरानी नंबर प्लेट लगी है। इसमें भी अंकों को टेंपर कर दिया जाता है। जिन गाड़ियों में हाई सिक्यूरिटी नंबर प्लेट लगी है, उन गाड़ियों को पूरी तरह तिरपाल से ढककर निकाला जाता है। जिससे कैमरे में ओवरलोड मौरंग भरी होने की तस्वीर ही नहीं आती है। जिले से मध्य प्रदेश की तरफ से प्रतिदिन करीब करीब छह से सात सौ भारी वाहन प्रतिदिन निकलते हैं। लोकेशनबाजों के जरिए ऐसे वाहनों को रात एक बजे से भोर चार बजे तक निकलवाया जाता है।
जिले में मुख्यालय की कोतवाली सहित सभी संबंधित प्रमुख पुलिस चौकियों के अलावा मटौंध ,कोतवाली देहात ,चिल्ला ,तिंदवारी , कमासिन ,मर्का, पैलानी ,जसपुरा ,नरैनी ,कालिंजर और गिरवां के स्योढ़ा के अलावा छतरपुर से आने वाले वाहन करतल होते हुए प्रवेश करते हैं। शासन ने हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट अनिवार्य की है। जबकि माफिया मौरंग ढोने वाले वाहनों को पुरानी नंबर प्लेट लगा ही चल रहे हैं। वजह, जिले में कोई टोल नहीं पड़ता है, जिससे यह पकड़ में नहीं आते हैं। थैली की खनक में ऐसे वाहनों की ओर से अफसर आंख बंद किए रहते हैं?










