विनोद मिश्रा
बाँदा। पर्यावरण दिवस पर जिले को हरा भरा करने का मेगा प्लान पूरी तरह फेल हो गया। 54 लाख वृक्षारोपण का ऐतिहासिक लक्ष्य जमीन पर उतरने से पहले ही दम तोड़ गया। मुख्यमंत्री के सख्त निर्देश और जन आंदोलन के दावे महज फाइलों की शोभा बनकर रह गए। जिले में प्रकृति संरक्षण के लिए 54 लाख पौधे लगाने का टारगेट रखा गया था। वन विभाग को अकेले 18 लाख पौधे लगाने थे। बाकी 36 लाख का जिम्मा 26 सरकारी विभागों और निजी कंपनियों पर था। पर हकीकत यह है कि अभियान शुरू होते ही ‘टांय टांय फिस्स’ हो गया। न गड्ढे खुदे, न पौधे लगे। सरकारी विभागों में कुछ पौध रोपण के नजारे दिखे। राज्य मंत्री रामकेश,विधायक प्रकाश दिवेदी, चाईल्ड ट्रस्ट दिल्ली के स्टेट कोआर्डिनेटर महेंद्र सिंह गौतम पौध रोपण करते नजर आये।

इस बार अभियान को भावनात्मक बनाने के लिए ‘एक पेड़ मां के नाम’ थीम रखी गई। ‘मेरी लाइफ पोर्टल’ पर फोटो अपलोड कर राष्ट्रीय हरित क्रांति से जुड़ने का ढोल भी पीटा गया। पर जब पौधे ही लक्ष्य के अनुरूप नहीं रोपे गए तो पोर्टल पर कौन सी तस्वीर लगेगी। जनता पूछ रही है कि मां के नाम पर भी यह ढोंग क्यों? आरोप है कि भ्रष्ट नीति के चलते अकेले वन विभाग 18 लाख का लक्ष्य पूरा करने में नाकाम रहा। 469 ग्राम पंचायतों में अभियान चलाने का दावा डीएफओ अरविंद कुमार ने किया था। पर गांव गांव में सन्नाटा है। 5 लाख फलदार पौधे लगाकर पोषण सुरक्षा का सपना भी कागजों तक सिमट गया।
जिन 26 विभागों को 36 लाख पौधरोपण का जिम्मा दिया गया था, उनका हाल और बुरा है। दिखावटी खानापूरी के सिवा किसी ने गंभीरता नहीं दिखाई। प्रशासनिक अमला फोटो खिंचाने तक सीमित रहा। नतीजा, पर्यावरण संतुलन और हरियाली का सपना चकनाचूर हो गया। 54 लाख पौधों के लिए करोड़ों का बजट आवंटित हुआ। नर्सरी से पौधे उठे,गाड़ियां दौड़ीं,बोर्ड लगे। पर धरातल पर हरियाली गायब है। मुख्यमंत्री चाहते थे कि वृक्षारोपण औपचारिकता न रहे। पर बाँदा में अफसरशाही ने इसे सरकारी नौटंकी बना दिया। न जनभागीदारी दिखी, न इच्छाशक्ति। पर्यावरण दिवस पर लिया गया संकल्प अगली बारिश से पहले ही सूख गया।











