कुमार गौरव
बांदा। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं, जिन्हें महिला एवं बाल विकास विभाग की ‘रीढ़’ माना जाता है, एक बार फिर से अपने अधिकारों की मांग को लेकर मुखर हो गई हैं। वर्षों से लंबित मांगों और सरकारी घोषणाओं के जमीन पर न उतरने से आहत कर्मियों ने अपने आंदोलन को एक निर्णायक मोड़ देने का फैसला किया है। आंगनबाड़ी संयुक्त मोर्चा के आह्वान पर जिला मुख्यालय पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांगों को लेकर जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन में उनकी प्रमुख मांगें मानदेय में तत्काल वृद्धि और कार्य की बेहतर पारदर्शिता के लिए उच्च गुणवत्ता वाले मोबाइल फोन उपलब्ध कराना रही।

संयुक्त मोर्चा के पदाधिकारियों ने बताया कि वे पिछले कई वर्षों से अपनी इन्हीं मांगों को लेकर शासन और विभागीय अधिकारियों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। उनका कहना है कि अब तक ज्ञापन दिए जाने, गोष्ठियाँ आयोजित करने और अधिकारियों से संवाद सब कुछ हो चुका है, लेकिन जमीनी हकीकत में कोई बदलाव नहीं आया है। सीमित मानदेय, लगातार बढ़ते कार्यभार और कामकाज के लिए आवश्यक संसाधनों की कमी ने आंगनबाड़ी कर्मियों की कार्यशैली और जीवन स्तर, दोनों को ही कठिन बना दिया है।

ज्ञापन में मुख्यमंत्री द्वारा सितंबर 2023 के अंतिम सप्ताह में की गई उस घोषणा का भी स्पष्ट उल्लेख किया गया है, जिसमें आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के मानदेय में वृद्धि और उन्हें बेहतर मोबाइल फोन उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया गया था। मोर्चा ने आरोप लगाया है कि महीनों बीत जाने के बावजूद इन घोषणाओं पर अमल की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है, जिसके कारण कार्यकर्ताओं के बीच गहरा असंतोष और हताशा फैली हुई है।
आंगनबाड़ी कर्मी ग्रासरूट स्तर पर कुपोषण दूर करने, बच्चों के पोषण स्तर में सुधार, गर्भवती व स्तनपान कराने वाली महिलाओं की देखभाल और प्राथमिक शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण कार्यों की धुरी हैं। उनका कहना है कि इतने महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन करने वालों के साथ सरकार का रवैया उपेक्षापूर्ण बना हुआ है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो उन्हें अपना आंदोलन और तेज करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।











