March 10, 2026 11:46 am

संसद सत्र शुरू, बुंदेलखंड के भाग्य का फैसला क्या करगें बुंदेली सांसद? या रहेंगे मौन!

कुमार गौरव

बांदा। संसद के वर्तमान सत्र के प्रारंभ होते ही बुंदेलखंड क्षेत्र में एक नई चर्चा छिड़ गई है। यहां की जनता की निगाहें अब अपने सांसदों पर टिकी हैं, जिनसे उम्मीद है कि वे संसद के मंच से बुंदेलखंड को अलग राज्य दिलाने की मांग को सुनिश्चित करेंगे। लेकिन लंबे समय से चली आ रही निराशा और विश्वासघात की भावना के बीच, यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या इस बार सांसद सचमुच आवाज उठाएंगे या फिर एक बार फिर घड़ियाली आंसू बहाकर जनता को शांत करने में ही मुखर होंगे। बुंदेलखंड के सांसदों का दोहरा रवैया अब जनमानस में चर्चा का विषय बन गया है। चुनावों के दौरान वे बुंदेलखंड के विकास और पृथक राज्य की मांग को लेकर जोरदार अभियान चलाते हैं, लेकिन एक बार संसद पहुंचते ही यही नेता महत्वपूर्ण मुद्दों पर चुप रहने की परंपरा निभाते आए हैं। इसी को लेकर स्थानीय विश्लेषकों का कहना है कि संसद का यह वर्तमान सत्र बुंदेलखंड के राजनीतिक भाग्य के साथ-साथ इस क्षेत्र के सांसदों की “कलई खोलने” का अवसर बन सकता है। “चुनाव के वक्त ये सांसद बुंदेलखंड के नाम पर सीना तानकर बोलते हैं, बड़े-बड़े वादे करते हैं। लेकिन संसद में पहुंचते ही यही लोग भीगी बिल्ली बन जाते हैं,” टिप्पणी करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता राजेश यादव ने कहा, “अब देखना यह है कि क्या इस सत्र में वे वाकई बुंदेलखंड राज्य की मांग को सदन में एकजुटता से उठाते हैं या फिर राजनीतिक समझौतों के चलते मौन साध लेते हैं।”

बुंदेलखंड के स्थानीय निवासियों का मानना है कि पिछड़ेपन और विकास की कमी से जूझ रहे इस क्षेत्र को एक अलग राज्य का दर्जा मिलना ज़रूरी है। सालों से यहां के अधिकांश जिलों में बुनियादी सुविधाएं अभी भी गायब हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और रोजगार के अवसरों की हालत चिंताजनक है। ऐसे में आम जन यह सवाल उठा रहा है कि जब भारत जैसे विशाल देश में छोटे-छोटे राज्य बन सकते हैं, तो बुंदेलखंड क्यों नहीं? हालांकि, राजनीतिक दलों की ओर से पृथक राज्य की मांग को समर्थन देने में लचरता देखी गई है। कई बार यह मांग चुनावी घोषणा पत्रों में जरूर शामिल रही है, लेकिन केंद्र सरकार में सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल होने के बाद यह मुद्दा पृष्ठभूमि में धकेला जा चुका है।

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