कुमार गौरव
बांदा। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में खनन माफियाओं का दुस्साहस चरम पर है। प्रशासन की ओर से की जा रही छिटपुट छापेमारी और जुर्माने की कार्रवाई के बावजूद जिले में अवैध खनन और ओवरलोडिंग का ‘व्यवसाय’ पहले की तरह ही फल-फूल रहा है। दो करोड़ रुपये से अधिक का जुर्माना वसूलने का दावा करने वाला प्रशासन, हकीकत में माफियाओं की मनमानी को रोकने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है।

नदियों की जलधारा पर कब्जा, बनाए जा रहे अवैध पुल केन नदी से निकलने वाले ‘लाल सोने’ (बालू) पर माफियाओं की नजरें गड़ी हैं। मुनाफे की होड़ में माफियाओं ने एनजीटी के सभी नियमों को ताक पर रख दिया है। जिले में संचालित दो दर्जन से अधिक खदानों में खुलेआम प्रतिबंधित भारी-भरकम मशीनों (पोकलैंड) का इस्तेमाल किया जा रहा है। आलम यह है कि माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे प्रशासन को चुनौती देते हुए नदी की जलधारा के बीचों-बीच अवैध पुल तक बना रहे हैं, ताकि बालू की निकासी निर्बाध रूप से हो सके। इससे न केवल सरकारी राजस्व को भारी चूना लग रहा है, बल्कि नदी का इकोसिस्टम भी पूरी तरह तबाह हो रहा है।

जुर्माने की कार्रवाई महज ‘दिखावा’ जानकारों का कहना है कि प्रशासन द्वारा की जाने वाली छापेमारी केवल रस्म अदायगी है। जब भी शिकायतें बढ़ती हैं, तो अफसरों की टीम खदानों पर पहुंचकर मामूली जुर्माना लगाकर अपनी पीठ थपथपा लेती है। स्थानीय सूत्रों की मानें तो माफिया जितना जुर्माना सरकार को देते हैं, उससे कहीं अधिक राशि वे प्रशासनिक अधिकारियों को ‘सुविधा शुल्क’ के रूप में देकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। यही कारण है कि भारी जुर्माने के बाद भी धरातल पर व्यवस्था में कोई सुधार नहीं दिख रहा।अधिकारियों की चुप्पी पर सवाल खनिज विभाग और जिम्मेदार अधिकारी अक्सर चुप्पी साधे रखते हैं। जब अवैध खनन का तांडव खबरों की सुर्खियां बनता है, तब अधिकारी केवल बयानबाजी कर पल्ला झाड़ लेते हैं। इस संबंध में जब खनिज अधिकारी राज रंजन कुमार से संपर्क किया गया, तो उन्होंने रटा-रटाया जवाब देते हुए कहा, “शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाती है और संयुक्त टीम समय-समय पर छापेमारी भी करती है।”

पर्यावरण के लिए खतरा बनी ‘लालच की दौड़’ खनन माफिया और भ्रष्ट अधिकारियों की सांठगांठ का सीधा असर पर्यावरण पर पड़ रहा है। नदी की जलधारा को बदलकर मशीनों से खोदाई करने के कारण भू-जल स्तर गिरने और भविष्य में जल संकट गहराने की आशंका बनी हुई है। बावजूद इसके, सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाकर अपनी जेबें भरने का यह खेल बेरोकटोक जारी है।सवाल यह उठता है कि क्या जिले के आला अधिकारी इस संगठित लूट पर कभी कोई ठोस कार्रवाई करेंगे, या फिर यह ‘अवैध कमाई’ का सिलसिला इसी तरह चलता रहेगा और नदियां अपना अस्तित्व खोती रहेंगी?










