विनोद मिश्रा
बाँदा। नगर की सियासत में कभी ‘साहूकार’ कहे जाने वाले सपा नेता और पूर्व पालिका चेयरमैन मोहन साहू इन दिनों अपने ही बुने जाल में उलझते दिख रहे हैं। एक ‘चप्पल कांड’ ने उनकी सियासी साख पर ऐसा दाग लगाया है कि पार्टी भी अब किनारा करने का मन बना रही है? विरोधी तो पहले ही निशाना साध रहे थे,अब अपनों की चुप्पी सबसे ज्यादा चुभ रही है।

अनुसूचित जाति की महिला गीता द्वारा उत्पीड़न एवं जान से मारने का प्रयास जैसे आरोपों का गंभीर धाराओं मे शहर कोतवाली में मोहन साहू व तीन अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज होना,यह पूरा घटनाक्रम उनके लिए ‘सियासी भूकंप’ से कम नहीं है। भले ही मोहन साहू ने भी पीड़िता और एक पत्रकार पर केस दर्ज कराया हो,पर जनता की अदालत में प्रश्न तो खड़े हो ही गए हैं। चप्पल वाली घटना ने वह कह दिया जो हजार भाषण नहीं कह पाते।

समाजवादी पार्टी में मोहन साहू का नाम अब ‘असहज करने वाला अध्याय’ बन गया है। संगठन की छीछालेदर की गूंज सीधे लखनऊ तक पहुंची है। प्रांतीय संगठन के कान खड़े हो गए हैं। अंदरखाने चर्चा तेज है कि पार्टी अपनी छवि बचाने के लिए ‘ऑपरेशन क्लीन’ चलाने जा रही है। इस ऑपरेशन की पहली जद में मोहन साहू का नाम है। कभी टिकट के दावेदार, अब संगठन से दूरी के हकदार। भाजपा और बसपा के स्थानीय नेता भले खुलकर कुछ न बोलें, पर दबी जुबान में यही कह रहे हैं कि कर्मों का फल तो मिलता ही है। सोशल मीडिया पर भी मोहन साहू निशाने पर हैं। ‘बकरे की मां कब तक खैर मनाए’ वाली कहावत वायरल है।
राजनीतिक पंडित मानते हैं कि आगामी निकाय और विधानसभा चुनाव में यह मामला सपा के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। कभी अपनी ‘मोहनी’ से वोटरों को रिझाने का दावा करने वाले मोहन साहू का जादू अब पार्टी आलाकमान पर बेअसर दिख रहा है। लखनऊ तक फोन घनघना रहे हैं। संकेत साफ है कि संगठन दागी छवि का बोझ ढोने के मूड में नहीं है। फिलहाल कानून अपना काम कर रहा है और सियासत अपना। मोहन साहू के लिए यह दौर ‘करो या मरो’ जैसा है। गढ़ बचाना मुश्किल है और पार्टी बचाएगी,इसके आसार भी कम हैं। बाँदा की सियासत में यह देखना दिलचस्प होगा कि ‘साहूकार’ की सियासत का अगला अध्याय क्या लिखता है।











