कुमार गौरव
बांदा। श्रमिकों के हक में बनाए गए “साप्ताहिक बंदी कानून की अब दुकानों की शटर से नहीं, सुविधा शुल्क से पहचान” हो रही है। जिले भर में लागू “बंदी नियम अब सिर्फ कागजों की शोभा” बनकर रह गया है! बाजार हफ्ते के सातों दिन खुलेरहते हैं। “श्रम विभाग मौन रहकर मार्केट में अपनी ‘वैल्यू’ सेट” कर रहा है। शहर से लेकर तिंदवारी, जसपुरा, पैलानी, बबेरू, अतर्रा, नरैनी, बदौसा और ओरन-कमासिन जैसे कस्बों तक कानून की सरेआम धज्जियां उड़ रही हैं। “व्यापारिक प्रतिष्ठान हर दिन चकाचक खुले”रहते हैं।

सरकार की मंशा थी कि दुकानदार व कर्मचारी हफ्ते में एक दिन आराम कर परिवार के साथ समय बिता सकें,अपने जरूरी काम निपटा सकें और फिर नए जोश से काम पर लौटें। लेकिन हकीकत ये है कि “श्रमिकों को अब सातों दिन पसीना बहाना” पड़ता है, और श्रम विभाग ‘नजराना’ लेकर आंखें मूंद लेता है। कोरोना काल में प्रशासन ने व्यापारियों को थोड़ी ढील दी थी, ताकि आर्थिक संकट से उबर सकें। लेकिन अब जब महामारी खत्म हो चुकी है, तब भी साप्ताहिक बंदी लागू नहीं की जा सकी। बाजारों में सप्ताह की कोई पहचान नहीं, हर दिन व्यापार वैसा ही, कर्मचारियों की मेहनत वही, लेकिन आराम का दिन गायब!

शहर में भले ही मंगलवार को कुछ दुकानों पर ताले नजर आ जाते हों, लेकिन कस्बों में तो साप्ताहिक बंदी का नामोनिशान तक नहीं बचा। बदौसा से लेकर जसपुरा तक, हर बाजार में दुकानें खुली हैं और श्रमिक मजबूर हैं थक कर भी काम करने को। सूत्रों की मानें तो कई व्यापारी श्रम विभाग को नियमित सुविधा शुल्क देकर बंदी से ‘छूट’ खरीद लेते हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि अगर सुविधा शुल्क ही कानून की जगह लेने लगा है, तो फिर नियम किसके लिए हैं?










