April 20, 2026 3:52 am

राष्ट्रीय रामायण मेला समापन दिवस पर रामकथा के चरमोत्कर्ष पर पहुंचा: हजारों श्रोता रामरस में डूबे।

कुमार गौरव

चित्रकूट। पांच दिवसीय रामायण मेला अपने समापन अवसर पर अपनी गरिमा के चरमोत्कर्ष पर पहुंच गया। रामचरित मानस की गूढ़ व्याख्याओं का सरल भाषा में प्रस्तुती करण एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम नें हजारों श्रोताओं एवं दर्शकों को भाव विभोर कर उनके अन्तःकरण को भक्ति रस सें विभोर कर दिया। समापन समारोह में आयोजित विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम और विद्वत गोष्ठी हुई। हैदराबाद खाकी अखाड़ा रामबाग तरौहा के महंत अमृतदास महाराज ने कहा कि रामायण राम जी की प्राप्ति का सोपान है और यह मेला जन-जन को राम बनने की प्रेरणा देता है।

विद्वत गोष्ठी में विभिन्न विद्वानों ने रामायण और रामकथा पर अपने विचार प्रस्तुत किए। डॉ० छेदीलाल कांस्यकार ने कहा कि रामकथा जन-जन तक पहुंचाने के लिए रामचरित मानस की रचना तुलसी दास ने की थी। डॉ० जंगबहादुर पाण्डेय ने कहा कि तुलसी का रामचरित मानस विश्व साहित्य का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों में विभिन्न कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति दी, जिसमें भजन, नृत्य और नाटक शामिल थे। लखनऊ से पधारे सुप्रसिद्ध भजन गायक राधेश्याम पाल ने अपने भजनों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। विजवान फाउन्डेशन नई दिल्ली ने ध्वनि व प्रकाश के माध्यम से कृष्ण नृत्य नाटिका का भव्य मंचन किया। मेले के समापन समारोह में डॉ० चन्द्रिका प्रसाद दीक्षित ने अपने शोध पत्र में बताया कि 18वीं शताब्दी में महाकवि चन्द्रदास ने राम विनोद नामक महाकाव्य की रचना की, जिसमें उन्होंने रामकथा के माध्यम से मध्यकाल के वीरों के बलिदानों को प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि इस महाकाव्य में राम के चरित्र को एक नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है, जो कि भारतीय संस्कृति और इतिहास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। समापन समारोह में उपस्थित लोगों ने रामायण मेला के आयोजकों को बधाई दी और कहा कि यह मेला भारतीय संस्कृति और परंपरा को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इस अवसर पर मेले के कार्यकारी अध्यक्ष प्रशांत करवरिया ने कहा कि उनका प्रयास है की यह मेला अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण करें। मेला समिति इसे और भी भव्य और आकर्षक बनाने के लिए प्रयासरत है। महामंत्री करुणा शंकर दिवेदी, उप मंत्री प्रद्युमदुबे लालू,मनोज गर्ग एवं प्रचार मंत्री राम बाबू पांडे का मेला के प्रति समर्पण उल्लेखनीय एवं प्रेणनास्रोत रहा।

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