कुमार गौरव
बांदा। बुंदेलखंड की धरती पर इन दिनों “बालू नहीं, सोना लूटा जा रहा है” और ये कोई मामूली आरोप नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत बनता जा रहा है। “साड़ी खंड-एक खदान” में जो खेल चल रहा है, उसने कानून, प्रशासन और शासन “तीनों को कठघरे” में खड़ा कर दिया है। और इसके मुख्य केंद्र में है “पूर्वांचल का बाहुबली व भाजपा का पूर्व सांसद ” । सूत्रों के मुताबिक, इस खदान में खनन नियमावली को खुलेआम ठेंगा दिखाया जा रहा है। रात हो या दिन मशीनें गरज रही हैं, बालू की अवैध निकासी बेखौफ जारी है, और कानून? वो जैसे कहीं सो गया है। चर्चाओं का बाजार गर्म है कि इस पूरे खेल के पीछे बलिया से जुड़े एक पूर्व सांसद की “छत्रछाया” है। आरोप है कि उनके संरक्षण में “खनन माफिया” इतना बेखौफ हो चुका है कि प्रशासन को ही अपने इशारों पर नचा रहा है।

इस अवैध खनन स्थल की सुरक्षा किसी सरकारी प्रोजेक्ट जैसी नहीं, बल्कि किसी माफिया के किले जैसी है। दर्जनों असलहाधारी, लग्जरी गाड़ियों में घूमते हुए, हर गतिविधि पर नजर रखते हैं। बाहरी व्यक्ति के लिए यहां झांकना भी जोखिम भरा बताया जा रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि खदान का पट्टा बांदा में है, लेकिन खनन की परिधि हमीरपुर की सीमा तक फैल चुकी है। यानी न सिर्फ नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं, बल्कि जिलों की सीमाएं भी “माफिया के लिए मज़ाक” बन चुकी हैं। इतनी बड़ी खदान, इतना बड़ा कारोबार लेकिन निगरानी के लिए सीसीटीवी तक नहीं! सवाल उठता है कि ये लापरवाही है या जानबूझकर आंखें मूंद ली गई हैं? खनन की हदें इतनी पार हो चुकी हैं कि पंप कैनाल के पास तक खुदाई हो रही है। ये न सिर्फ नियमों का उल्लंघन है, बल्कि भविष्य में बड़े पर्यावरणीय संकट की चेतावनी भी।

खनिज अधिकारी राज रंजन का कहना है कि जल्द ही औचक निरीक्षण किया जाएगा। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या ये निरीक्षण सिर्फ खानापूर्ति होगा या वाकई कार्रवाई की हिम्मत दिखाई जाएगी? जब आरोप सत्ता के संरक्षण तक पहुंचते हों, जब खनन माफिया खुलेआम चुनौती दे रहा हो, तब सबसे बड़ा सवाल यही उठता है आखिर “बिल्ली के गले में घंटी” कौन बांधेगा? बांदा की ये खदान अब सिर्फ खनन का मुद्दा नहीं रही, ये बन चुकी है सत्ता, सिस्टम और संगठित माफिया के गठजोड़ की कहानी। अब नजरें टिकी हैं प्रशासन पर क्या वो जागेगा, या “धृतराष्ट्र” बना रहेगा?










