कुमार गौरव
बांदा। बुंदेलखंड की “जीवनदायिनी नदियां” आज “माफिया के शिकंजे” में कराह रही हैं। केन नदी का “लाल सोना” अब “सरकारी खजाने” में नहीं, बल्कि “माफिया की तिजोरियों” में भर रहा है। “हैरानी” की बात ये है कि “करोड़ों के जुर्माने और छापेमारी” के बावजूद यह “खेल और ज्यादा बेखौफ” होता जा रहा है। हाल ही में “दो करोड़ से अधिक का जुर्माना” लगाया गया, लेकिन इसका “असर शून्य” है। खदानों में “वही तांडव, वही अवैध निकासी, वही ओवरलोडिंग” “मानो कानून का कोई डर ही नहीं”! नदी की जलधारा के बीचोंबीच भारी-भरकम प्रतिबंधित मशीनें गरज रही हैं। यह सिर्फ अवैध खनन नहीं, बल्कि “प्रकृति के साथ सीधा युद्ध” है। हद तो तब हो गई जब बालू माफिया ने नदी के ऊपर अस्थायी पुल बनाकर ट्रकों की आवाजाही शुरू कर दी। यह सब कुछ खुलेआम हो रहा है, जैसे प्रशासन को सीधी चुनौती दी जा रही हो। जिले में दो दर्जन से अधिक खदानें संचालित हैं और लगभग हर जगह अवैध खनन का खेल जारी है।
माफिया का फोकस सिर्फ एक चीज पर है केन नदी का ‘लाल सोना’।

सूत्रों के मुताबिक, बालू माफिया अपनी कमाई का मोटा हिस्सा बांटकर पूरे सिस्टम को “मैनेज” करता है। इसी वजह से जिम्मेदार अधिकारी अक्सर आंखें मूंदे रहते हैं और कार्रवाई सिर्फ दिखावा बनकर रह जाती है। माफिया की कमाई के सामने जुर्माना बेहद छोटा है। बताया जाता है कि जितना जुर्माना लगता है, उससे कई गुना रकम हर महीने “सेटिंग” में खर्च होती है।
खनिज अधिकारी राज रंजन कुमार का कहना है कि शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाती है और समय-समय पर छापेमारी होती है। लेकिन जमीनी सच्चाई इन दावों को कटघरे में खड़ा करती है। जब सब कुछ खुलेआम हो रहा है, तो सवाल उठता है क्या माफिया को किसी का संरक्षण है? क्यों नहीं रुक रहा यह खेल? कब जागेगा प्रशासन? बालू खनन अब “अवैध कारोबार” नहीं, बल्कि “संगठित लूट” बन चुका है। और माफिया बेखौफ होकर “विजय पताका” फहरा रहा है!










