विनोद मिश्रा
बांदा। बबेरू विधानसभा सीट इस समय जिले की सबसे ‘हॉट’ सियासी सीट बन चुकी है। अंदरखाने चल रही “रणनीति और गठबंधन” की संभावनाओं ने “भाजपा खेमे में हलचल” तेज कर दी है। चर्चा है कि “पार्टी इस सीट को अपने सहयोगी “अपना दल एस” को “सौंप” सकती है, जिससे “चुनावी समीकरण” पूरी तरह “बदलने” की तैयारी में हैं!
सूत्रों के मुताबिक,बबेरू सीट को अपना दल (एस) के खाते में डालने पर “गंभीर मंथन” चल रहा है। इसके पीछे मुख्य कारण क्षेत्र में भाजपा की कमजोर पकड़ और समाजवादी पार्टी की मजबूत स्थिति को माना जा रहा है। इस सीट से जिला पंचायत अध्यक्ष सुनील सिंह पटेल टिकट के प्रमुख दावेदार माने जा रहे हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक छवि करोड़ों के भ्रष्टाचार के आरोपों से रंगी हुई है!वह तानाशाह एवं क्रूरता की कथित हदें पार करने वाले”छविधर”हैं ? जिला पंचायत से जुड़े विवाद और प्रशासनिक फैसलों ने उन्हें कथित तौर पर “लोक प्रियता के निचले पायदान” पर पहुंचा दिया है! वहीं भाजपा के पूर्व प्रत्याशी अजय पटेल और पूर्व विधायक चंद्रपाल सिंह कुशवाहा भी टिकट की दौड़ में हैं,लेकिन पार्टी के भीतर ही इनकी जीत की संभावनाओं को लेकर अत्यधिक संशय बना हुआ है! बबेरू सीट पर सपा विधायक विशंभर सिंह यादव की “मजबूत पकड़” भाजपा की “रणनीति पर भारी”पड़ रही है। जमीनी स्तर पर उनकी “सक्रियता और जनसंपर्क”उन्हें एक मजबूत उम्मीदवार बनाता है। यहां तक कि “राजनीतिक चर्चा’ में यह भी सामने आता है कि भाजपा सहित विभिन्न दलों के कार्यकर्ता भी अपने कामों के लिए उनके पास पहुंचते हैं!
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के सामने इस सीट को लेकर दो विकल्प हैं या तो खुद चुनाव लड़े और जोखिम उठाए,या फिर गठबंधन को टिकट देकर जीत हार से अपना पीछा छुड़ाये। क्योंकि अपना दल एस के पक्ष में भी “जीत का एस”नहीं होने वाला? हालांकि,सीट सहयोगी दल को देने से स्थानीय नेताओं में असंतोष बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है। टिकट को लेकर भाजपा के भीतर खींचतान तेज है। दावेदारों की बढ़ती सक्रियता और अंदरूनी लॉबिंग ने माहौल को और गर्म कर दिया है। यह स्थिति पार्टी के लिए चुनाव से पहले एक बड़ी चुनौती बन सकती है! क्या भाजपा बबेरू सीट पर बड़ा दांव खेलेगी? या फिर गठबंधन की रणनीति अपनाकर मैदान से पीछे हटेगी।










