कुमार गौरव
बांदा। मरौली खण्ड-6 में जो चल रहा है,वह सिर्फ”अवैध खनन”नहीं यह खुलेआम “राज्य के भीतर समानांतर सत्ता” का ऐलान है।”दिन-रात” बालू की लूट,ओवरलोड ट्रकों की परेड और “हथियारबंद दबंगों” की “हनक” के बीच “कानून कहीं नजर” ही नहीं आता!प्रश्न गूंज रहे हैं की यह”आखिर किसके दम पर”?

स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, खदान संचालक विजय और उसके कथित करीबी आर.के. यादव व सौरभ सपा औऱ भाजपा के उच्च स्तर के नेताओं के खास हैं !इन पर आरोप है कि वे “बेखौफ होकर”अवैध खनन करा रहे हैं! भारी मशीनें दिन-रात चलती हैं,विरोध करने वालों को धमकाया जाता है। इलाके में डर का माहौल है। सूत्रों के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि खदान संचालक के के गुर्गे आर के यादव का संबंध समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व,खासकर अखिलेश यादव से होने की चर्चा है।

सबसे सनसनीखेज आरोप नदी की प्राकृतिक धारा को रोककर अस्थायी पुलनुमा ढांचा खड़ा कर दिया गया। नियम साफ कहते हैं कि बिना राज्यपाल की नोटी फिकेशन के ऐसा निर्माण अपराध है। फिर भी यह सब हुआ और जिम्मेदार विभाग खामोश है ! क्या पर्यावरण और कानून, दोनों को बंधक बना लिया गया है? खनन स्थल से निकलने वाले ट्रक कथित तौर पर ओवरलोड हैं और उनके पास फर्जी परिवहन दस्तावेज (रवन्ना) होने के आरोप हैं। कहा जा रहा है कि चेकिंग के नाम पर ‘लुका-छिपी’ का खेल चलता है और हर बार यह नेटवर्क बच निकलता है। अगर निष्पक्ष जांच हो जाए, तो इसमें संलिप्त पूरी चेन उजागर होगी?

इलाके में चर्चा है कि इस कारोबार को ताकतवर सियासी और प्रशासनिक संरक्षण हासिल है। प्रश्न है की अगर संरक्षण नहीं, तो इतनी बेखौफी क्यों? मरौली और आसपास के गांवों के लोग कहते हैं शिकायत करो तो दबाव बढ़ता है,सुनवाई नहीं। रात-दिन मशीनों की आवाज, धूल और डर यही हकीकत है। यह मामला अब सिर्फ अवैध खनन का नहीं रहा यह प्रशासनिक जवाबदेही, पर्यावरण सुरक्षा और कानून के राज की परीक्षा है ! अब निगाहें शासन-प्रशासन पर है! क्या ‘बालू माफिया’ का किला टूटेगा, या मरौली में यूं ही चलता रहेगा ‘काला साम्राज्य’?











