कुमार गौरव
बांदा। “बालू का खेल” सुर्खियों में है लेकिन इस बार मामला सिर्फ खनन का नहीं,बल्कि कथित तौर पर सत्ता,सिस्टम और बाहुबल के गठजोड़ का है! “साड़ी खंड एक” बालू खदान विशेष चर्चा के केंद्र में है,जहां नियमों को ताक पर रखकर दिन-रात अवैध खनन का खेल चल रहा हैं। “बालू की अंधाधुंध अवैध निकासी” की जा रही है।

लोगों का कहना है कि खनन की रफ्तार इतनी तेज है कि केन नदी का प्राकृतिक संतुलन तक प्रभावित होने लगा है। नदी किनारों तक मशीनों की दस्तक और गहराई तक खुदाई क्या यह सिर्फ खनन है या संसाधनों का अंधाधुंध दोहन? आरोप है कि खदान में तय मानकों की अनदेखी कर ओवरलोडिंग और सीमा से अधिक खनन किया जा रहा है। रात-दिन दौड़ते ट्रकों की कतारें इस बात की गवाही देती हैं कि यहां “रफ्तार” नियमों से कहीं ज्यादा तेज है।

क्षेत्र में चर्चा है कि खदान संचालन के पीछे प्रभावशाली लोगों का संरक्षण है। सूत्रों की यदि सच मानें तो खंड संचालक “सीएम योगी एवं पूर्वांचल के पूर्व बहुचर्चित सांसद धनंजय सिंह” का कथित तौर पर अपने को “खास” बताता है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार उठती आवाजें और सवाल इस पूरे मामले को और गंभीर बना रहे हैं!

सबसे बड़ा सवाल प्रशासन की भूमिका को लेकर उठ रहा है, क्यों नहीं रुक रहा अवैध खनन? क्या निगरानी तंत्र फेल हो चुका है? या फिर कार्रवाई कहीं दब तो नहीं रही? जब सवाल इतने बड़े हों, तो खामोशी खुद सबसे बड़ा जवाब बन जाती है। अब यह मुद्दा सिर्फ खनन का नहीं, बल्कि व्यवस्था की साख का बन गया है। क्या ‘बालू माफिया’ कानून से ऊपर हो गया है? क्या सिस्टम दबाव में है या उदासीन? क्या इस खेल पर कभी लगाम लगेगी?
खनिज विभाग का कहना है कि शिकायतें मिली हैं और औचक निरीक्षण किया जाएगा।लेकिन विचारणीय यह है की क्या यह निरीक्षण सिर्फ कागजों तक रहेगा या जमीनी स्तर पर सख्ती दिखेगी? अगर समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह “बालू का तांडव” सिर्फ नदी ही नहीं, बल्कि प्रशासन की विश्वसनीयता को भी बहाकर ले जाएगा।










