विनोद मिश्रा
बांदा। बुंदेलखंड की राजनीति में इन दिनों एक ही नाम “जन-जन की जुबान पर चढ़ चुका है वह है विधायक प्रकाश द्विवेदी”।

गांव की चौपाल हो या शहर की सड़क, पीड़ित की पुकार हो या विकास की मांग हर जगह जब जनता को किसी अपने की जरूरत होती है, तो आवाज़ उठती है “प्रकाश भइया”।

यह यूं ही नहीं है, बल्कि वर्षों की मेहनत, संघर्ष और जमीन से जुड़ी राजनीति का नतीजा’ है, जिसने ‘प्रकाश द्विवेदी को साधारण विधायक से जननायक के रूप में स्थापित’ कर दिया है।

विधायक प्रकाश द्विवेदी ने जनप्रतिनिधि की परिभाषा को नए सिरे से गढ़ा है। उन्होंने राजनीति को न तो सिर्फ मंचीय भाषणों तक सीमित रखा और न ही फाइलों की कैद में रहने दिया। ‘जनता की समस्या जहां, प्रकाश द्विवेदी वहां’। अब यही उनकी ‘पहचान’ बन चुकी है।

जब भी जिले में कोई ‘जनसैलाब’ उमड़ता है या किसी ‘पीड़ित परिवार की चीख’ सत्ता के ‘कानों’ तक नहीं पहुंच पाती, तब ‘प्रकाश द्विवेदी की मौजूदगी माहौल को जनआंदोलन’ में बदल देती है।

लोग उनके लिए वही पंक्तियां दोहराते हैं “चल पड़े जिधर दो डग मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर, पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि,गड़ गए कोटि दृग उसी ओर।” यह पंक्तियां “प्रकाश द्विवेदी की राजनीतिक छवि को पूरी तरह परिभाषित” करती हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन, गृह मंत्री अमित शाह की रणनीति और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्त प्रशासनिक कार्यशैली से प्रेरित विधायक प्रकाश ने ‘सबका साथ, सबका विकास’ के मंत्र को केवल नारों तक सीमित नहीं रहने दिया।

इसे जमीनी विकास, अपराध नियंत्रण और प्रशासनिक जवाबदेही में बदलकर दिखाया है। प्रकाश द्विवेदी की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता से अपनी ही पार्टी के कुछ असंतुष्ट चेहरे भी भीतरघात की कोशिशों में लगे रहते हैं, लेकिन ये कोशिशें भी ‘जनसमर्थन की आंधी में उड़कर बिखर’ जाती हैं।

यही वजह है कि आज उनकी ‘पहचान एक निर्भीक, स्पष्टवादी और निर्णायक जनप्रतिनिधि’ के रूप में होती है। बुंदेलखंड की जनता उन्हें सम्मान और गर्व के साथ ‘शेरे बुंदेलखंड’ कहती है।










