विनोद मिश्रा
बाँदा। समाजवादी पार्टी में नरैनी विधानसभा सीट को लेकर टिकट की जंग दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है। दावेदारों की फौज मैदान में उतर चुकी है पर पार्टी के अंदर ही तलवारें खिंच गई हैं। हालात ऐसे हैं कि टिकटार्थी गा रहे हैं “रूठे रूठे पिया मनाऊं कैसे, घर जाऊं कैसे”। कार्यकर्ता असमंजस में हैं कि असली सरदार कौन होगा।

नरैनी सुरक्षित सीट पर पिछले चुनाव में किरण वर्मा सपा की प्रत्याशी थीं। भाजपा की ओममणि वर्मा से करीब साढ़े सात हजार वोट से हार गई थीं। पर हार के बाद से ग्राउंड पर किरण वर्मा का सिक्का नहीं चल रहा। कार्यकर्ताओं से 36 का आंकड़ा बन गया है। न बैठक, न दौरा, न संघर्ष। कोर वोटर पूछ रहा है कि मैडम जी, चुनाव के बाद आप कहां गुम हो गईं।

दूसरी तरफ पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष महेंद्र वर्मा चुनावी मथानी चला रहे हैं। गांव गांव चौपाल लगा रहे हैं। दमखम दिखा रहे हैं। सियासी गणित कहता है कि मौजूदा हालात में महेंद्र वर्मा किरण वर्मा पर भारी पड़ सकते हैं। लेकिन पार्टी के बिखरे हुए अरमानों को समेटना उनके लिए भी आसान नहीं है। गुटबाजी की दीवार इतनी ऊंची है कि साइकिल चढ़ नहीं पा रही।

सबसे बड़ा सस्पेंस रालोद के प्रदेश महासचिव वीरेंद्र साक्षी को लेकर है। उनके सपा में शामिल होने की चर्चा जोरों पर है। राजनीतिक गलियारों में कयास है कि अगर साक्षी साइकिल पर सवार हुए और टिकट मिला तो खेल पलट जाएगा। उनका अपना जनाधार है। एंट्री होते ही सपा की साइकिल कमल से आगे निकल सकती है।
मजे की बात यह है कि भाजपा विधायक ओममणि वर्मा कथित तौर पर अलोकप्रियता के चरम पर हैं। फिर भी सपा की आपसी लड़ाई उनके लिए “अंधे के हाथ बटेर” साबित हो सकती है। सपा के वोट बैंक में सेंध लग चुकी है। कोर कार्यकर्ता रूठा है। मतदाता छिटका हुआ है। अब सबकी निगाहें सैफई पर टिकी हैं। सपा का ऊंट किस करवट बैठेगा। टिकट का ताज किरण वर्मा के सिर सजेगा, महेंद्र वर्मा बाजी मारेंगे या वीरेंद्र साक्षी सबको चौंका देंगे। फिलहाल नरैनी में साइकिल की चेन उतरी हुई है और कार्यकर्ता पंचर जोड़ने वाला मिस्त्री तलाश रहे हैं। नरैनी की सियासी पिच पर मुकाबला रोचक है। पर सवाल यही है कि अपनों की लड़ाई में सपा कहीं अपनी ही सीट गंवा न दे।











