विनोद मिश्रा
चित्रकूट। मां मंदाकिनी नें 15 सेंटीमीटर में जल प्रलय गाथा लिख दी। रामघाट पर आज सन्नाटा है। वह कोलाहल जो आरती की भीड़,मंत्रों की गूंज और भक्तों के चरणों की थाप से बनता था, वह सब मिट्टी और कीचड़ में दफन है। देश के मानस में चित्रकूट का नाम भक्ति की निर्मल धारा और मंदाकिनी की मधुर छवि के साथ आता है,जो सदियों से इस तीर्थ की आत्मा रही है। मगर उसी प्राणदायिनी मंदाकिनी ने नौ दशक बाद ऐसा रौद्र रूप दिखाया कि पूरा तीर्थ जलमग्न हो गया। इसे महज बारिश मत समझिए,यह जलप्रलय था। जिसने प्रश्न छोड़ा है कि क्या हमने नदियों को पहचाना है या उनकी सहनशीलता को अपनी जीत समझ बैठे हैं।

कल तक जहां आरती की लौ लहरों पर टिमटिमाती थी, वहीं रामघाट आज जल समाधि में है। दुकानें, होटल, धर्मशालाएं, मठ डूब गए। नदी ने उन स्थानों तक पानी फैलाया जहां आम दिनों में सूखा रहता था। 400 से अधिक दुकानों की भाग्य रेखा मलबे में दब गई। बुनकर, व्यापारी, पुजारी, होटल संचालक सबके सपनों का संगम आंसुओं में बह गया। सती अनसुइया से गुप्त गोदावरी और कामदगिरि परिक्रमा तक सब जलमग्न रहा। इस आपदा ने संकेत दिया कि नदी ने अपना भूला हुआ मूल रास्ता याद दिला दिया। सरकारी अभिलेख में मंदाकिनी की चौड़ाई कहीं 40 तो कहीं 125 मीटर दर्ज है,पर वह साल-दर-साल सिकुड़ती रही। किनारों पर अतिक्रमण और अवैध निर्माण ने उसकी सांस छीन ली।

2003 में जलस्तर 134.50 मीटर था, इस बार 134.65 मीटर। सिर्फ 15 सेंटीमीटर ज्यादा,पर तबाही कई गुना। पानी ज्यादा नहीं था,फैलने की जगह नहीं थी। आपदा का पैमाना नदी ने नहीं, हमने बढ़ाया। राहत यह रही कि प्रशासन की चेतावनी और सेना के हेलीकॉप्टरों से जान का नुकसान नहीं हुआ,पर जीविका बह गई। रामघाट-हनुमानधारा पुल बह गया है, उसे बनने में 8-9 महीने लगेंगे, दीपावली के लिए अस्थायी पुल की योजना है। यह बाढ़ पूरे देश के लिए दर्पण है। जिसे हम मां कहते हैं,उसे ही हमने कैद कर दिया। असली श्रद्धा आरती तक नहीं, नदी की जगह बचाने और सम्मान देने में है। अब वैज्ञानिक सीमांकन, अतिक्रमण मुक्ति, निर्माण पर रोक, मजबूत चेतावनी तंत्र और पुनर्वास की स्थायी योजना ही चित्रकूट को बचा सकती है, नहीं तो हर मानसून में यही कहानी दोहराएगी।










