कुमार गौरव
बांदा। जिले में पेंशनभोगियों के बीच केंद्र सरकार के नए अधिनियम को लेकर असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। संयुक्त पेंशनर्स कल्याण समिति के नेतृत्व में पेंशनर्स ने इस फैसले के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और जिलाधिकारी के माध्यम से प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। समिति का आरोप है कि इस अधिनियम को बिना किसी पूर्व सूचना और पर्याप्त चर्चा के वित्त विधेयक में जोड़कर जल्दबाजी में पारित किया गया, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की भावना के विपरीत है।

समिति के अनुसार, नए प्रावधान के तहत अब सेवानिवृत्ति की तिथि को ही पेंशन पात्रता का आधार बनाया जाएगा। इससे वे लाखों पेंशनभोगी प्रभावित होंगे, जो पहले के वेतन आयोगों से पहले सेवानिवृत्त हुए हैं। उनका कहना है कि इस बदलाव से “पुराने रिटायर्ड, नए फायदे से बाहर” की स्थिति बन रही है, जो समानता के सिद्धांत के खिलाफ है। पेंशनभोगियों ने यह भी कहा कि पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे बुजुर्गों के लिए यह निर्णय “दोहरी चोट” साबित होगा। पेंशन में संभावित कमी या अपेक्षित वृद्धि न होने से उनके दैनिक जीवन, स्वास्थ्य और जरूरतों पर सीधा असर पड़ सकता है। समिति का मानना है कि सरकार को इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए और सभी पेंशनर्स के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करना चाहिए।

पेंशनर्स ने डी.एस. नकारा बनाम भारत संघ (1983) के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पेंशन कोई दया नहीं, बल्कि कर्मचारियों का अधिकार है। साथ ही सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पहले और बाद में सेवानिवृत्त कर्मचारियों के बीच समानता बनाए रखने की बात कही गई थी, लेकिन नया अधिनियम इस संतुलन को तोड़ता नजर आ रहा है। समिति ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। आने वाले दिनों में बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन और जनजागरण अभियान चलाने की भी तैयारी की जा रही है, जिससे यह मुद्दा और तेज हो सकता है।











