विनोद मिश्रा
बांदा। रोडवेज डिपो में 14 हजार लीटर डीजल गायब होने का मामला अब एक ऐसी गुत्थी बन चुका है जिसे सुलझाना किसी के बस की बात नहीं रह गई है। जिम्मेदार अफसर जांच के नाम पर गेंद एक-दूसरे के पाले में डाल रहे हैं और सच कागजों के अंधेरे में दफन होता जा रहा है। जुलाई में डीजल लिपिक अनिल साहू ने सीधे क्षेत्रीय प्रबंधक राम लवट से शिकायत की थी कि डिपो में 14 हजार लीटर डीजल की हेराफेरी हुई है। शिकायत मिलते ही हड़कंप मच गया। आनन-फानन में जांच हुई तो घोटाले को “अनियमितता” का नाम दे दिया गया।

बताया गया कि 8 जुलाई को डीजल लेकर आया टैंकर टैंक में जगह न होने से खाली नहीं हो सका, लेकिन रजिस्टर में उसे उसी दिन खाली दिखा दिया गया। अधिकारी कह रहे हैं कि टैंकर 9 जुलाई को खाली हुआ। लेकिन प्रश्न यह है कि इसका सबूत कहां है? न सीसीटीवी, न गेट एंट्री,न कोई पुख्ता दस्तावेज। पहले 3 डीजल लिपिकों अनिल साहू, अनिल शुक्ला और सुधीर को निलंबित किया गया। फिर शासन ने वरिष्ठ स्टेशन प्रभारी सुशीला सचान और स्टेशन प्रभारी आरके वर्मा पर गाज गिराई। जूनियर फोरमैन सरोज कुमार को आरोप पत्र मिला। यानी गलती किसी की भी हो, सजा नीचे वालों को दी जा रही है। सबसे बड़ा पेंच यह है कि जांच ही नहीं हो पा रही।
जांच की जिम्मेदारी एआरएम वित्त एसके गुप्ता को दी गई है। लेकिन डीजल विभाग के रजिस्टर ही अधूरे मिले। महीनों से अभिलेख अपडेट नहीं। जब कागज ही नहीं होंगे तो 14 हजार लीटर का हिसाब कौन देगा? इतना ही नहीं,जांच अधिकारी ने पहले ही इस केस से हाथ खड़े कर दिए थे और कहा था कि जांच किसी और को दी जाए। लेकिन आरएम ने फिर से वही नाम आगे कर दिया। सरकारी संपत्ति का डीजल अगर डिपो के अंदर ही सुरक्षित नहीं है तो बाहर जनता क्या उम्मीद करे? “अनियमितता” कहकर मामले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश हो रही है। लेकिन 14 हजार लीटर डीजल हवा में नहीं उड़ गया। अब देखना यह है कि शासन इस उलझी गुत्थी को सुलझाता है या फिर फाइलों में दबाकर सब भूल जाता है।










